मैं इक चिराग जला कर बैठा हूँ...

मैं  इक  चिराग  जला  कर  बैठा  हूँ !
दर -ओ -दीवार  सजा  कर  बैठा  हूँ !!

वोह  आयेगा , बस  मैं  ये  जानता  हूँ !
अपनी  नज़रें  बिछा  कर  बैठा  हूँ !!

ख्वाब  है  , तिलिस्म  है  और  तू  है !
मैं  दिल  किससे लगा  कर  बैठा  हूँ !!

अब तो  जो  हो , बस  तुझको पाना  है !
मैं  दिल  से  अब  दुआ  कर  बैठा  हूँ !!

उसकी  नज़रों से मुहोब्बत  बहने लगी !
एक  बुत  को  खुदा  कर  बैठा  हूँ !!

कोई  देख न  ले  मेरी मुहोब्बत 'राजा' !
अपनी  पलकें झुका  कर  बैठा  हूँ !!

उसके  हसीं  लबों  को  चूम  लिया !
'राजा' आज  मैं  क्या  कर  बैठा  हूँ !!

तुम जो छूलो तो पत्थर पे असर हो जाए !

तुम  जो  छूलो  तो  पत्थर  पे  असर  हो  जाए !
तुम  जो  हो  साथ , तो  आसान   सफ़र  हो  जाए !!

तू  नहीं  जानती , तेरे  होने  का  जलवा  क्या  है !
सुबह  से  शाम , शाम  से   सहर  हो  जाए !!

बाद  तेरे  क्या  बताऊँ , हाल  बुरा  होता  है !
जी  तो  ये  चाहे , के  जान  तेरी  नज़र  हो  जाये !!

तेरे  दीदार  का  कुछ  ऐसा  असर  होता  है !
शेरों  को  परवाज़ , लब्जों  के  पर  हो  जाए !!

'राजा'  तेरी  दीवानगी  का  कहाँ  कोई  सानी  है !
तुझपे  भी  मेरी  मुहोबत   का  असर  हो  जाये !!

(*सानी = comparison )

चाँद फिर निकला है कुछ आवारा दोस्तों के साथ..

चाँद फिर निकला है कुछ आवारा दोस्तों के साथ
जाने किस गली मैं आज नज़र मारनी है
कच्ची उम्र का बुखार है ,
सोचते हैं सूरज कोई गेंद है
खेलेंगे सुबह होने तक

सुबह उठता हूँ , करवटें बदलता हूँ
सूरज फिर से फेरी लगाने आ गया
चादरों पे फिर वोही सिलवटें
खुश्क, आँखों के दरीचे हैं
कौन जाने आज क्या लेके आया है दिन

फिर ये सूरज , हर पल की जुगाली करके निकल जाएगा
रह जायेगा फिर वोही सन्नाटा ,
और मैं फिर अपनी नाज़ुक सी तनहाइयों के साथ
चाँद के आवारा दोस्तों से बचाता रहूँगा
भला ये सिलसिला कब तलक यूँही जारी रहेगा
और वोह कोई आखरी दिन होगा
या कोई आखरी रात होगी

मैं भला कब इन परछाइयों से डरने वाला हूँ
अभी जो गुज़र गई उम्र, वोह बीत गयी
बाकी बची है उसे याद रखने लायक बनाना है
बस एक सुबह अपने नाम लिखने की ख्वाईश है
बस एक सुबह अपने नाम लिखना है
बस एक सुबह अपने नाम लिखना है

ट्रेन मे AC का सफ़र

ट्रेन  मे  AC  का  सफ़र
बहुत  सूखा  सूखा सा  है !!
सब  अपनी  ही   धुन  मैं
अपने  अहम्  के  साथ
चार  कोने  मे  , चार  मुसाफ़िर !
अंजाम -ए -सफ़र  तक
अजनबी  रहकर , गुज़र  जाते  है !!

वहीँ , जनरल   बोगी का सफ़र,
इक मिसाल है, छोटे से सफ़र को कैसे   
इक अलग मुकाम तक ले जाना !!
यहाँ सफ़र के हर लम्हे मैं
किसी न किसी से गुफ्तगू
दीन दुनिया के बातें !!
कोई अपने बिटिया के ब्याह के लिए जा रहा है
तो कोई अपने नई नौकरी के लिए
किसी को अपनी माँ से मिलने जाना है
कोई घर से लड़ कर आया है
सबकी अपनी  अपनी कहानी है
अचानक ये ट्रेन इक कुनबा लगने लगता है
सब अपनी राम कहानी लिए
इक दुसरे से जी हल्का करते हुए !
कितना अपनापन बाँटते हुए
ये सफ़र, गुज़र जाने को है

कभी मैं सोचता हूँ
आम आदमी जितना छोटा होता है
दिल से उतना ही बड़ा होता है !
आज हम शायद, AC मे, तो बड़े आदमी हो गए हैं
दिल कहीं छोटा नज़र आने लगा है !

मुझको फिर से वोही जनरल मैं सफ़र करना है
आम आदमी से कोई ख़ास बात सीखना है
डरता हूँ कहीं छोटा न हो जाऊं
दिल से, दिमाग से...

मैं शाख से लिपटा हुआ पत्ता नहीं कोई

मैं शाख से लिपटा हुआ पत्ता नहीं कोई !
के हर खिजां मैं तुमने, मुझको जुदा किया !!

मैं रास्ते पे मील के  पत्थर की  तरहा !
हर आने जाने वाले मैं, तुमको देखा किया !!

मुझे इल्म था,  तू बुत के सिवा कुछ भी नहीं !
बस  मुहोब्बत है क्या करुँ , तुझको पूजा किया !!   

इक निगाहे शौक ने मुझको दीवाना कर दिया !
तू ख्वाब है ये जान कर, तुझे ख्वाब मैं देखा किया !!